Kanchan Kalash

रामचरितमानस: वाचक कौन, श्रोता कौन? यह कथा आज भी हर पीढ़ी को क्यों जोड़ती है

आज की generation content consume करती है—podcasts, reels, audiobooks।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत की सबसे जीवंत कथा-परंपरा कौन-सी है, जिसे देवता, ऋषि, मनुष्य और पक्षी—सबने सुना और सुनाया?

श्रीरामचरितमानस केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि listening culture का living example है।
यह कथा बताती है कि भक्ति में qualification नहीं, केवल समर्पण चाहिए।


गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा अवधी भाषा में रचित श्रीरामचरितमानस केवल सनातनधर्मावलम्बियों का कण्ठहार नहीं, बल्कि समस्त मानवजाति के लिए संजीवनी है।
अपनी विशाल और सर्वसमावेशी दृष्टि के कारण यह ग्रंथ युगों-युगों से विश्वव्यापक बना हुआ है।

तुलसीदास जी स्वयं इसके आदि उद्गम-स्थल का उल्लेख करते हैं।
मानस की प्रथम रचना भगवान् शिव के मानस में हुई—

“रचि महेस निज मानस राखा।
पाइ सुसमउ शिवा सन भाषा॥”

यह रामचरितमानस रूपी सुरसरि (गंगा) शिव के मानस से प्रकट होकर निरन्तर प्रवाहित हो रही है—

“चली सुभग कविता सरिता सो।
राम सुभग जस जल भरिता सो॥”

मानस की दृष्टि इतनी विशाल है कि ब्रह्मा की सृष्टि का कोई भी जीव इससे बाहर नहीं है।
यही कारण है कि इसके वाचक और श्रोता केवल मनुष्य नहीं, बल्कि देवता, ऋषि और पक्षी तक हैं।

भक्ति का यही सनातन सिद्धान्त है—
न कोई बड़ा, न कोई छोटा।
न विद्वान, न मूर्ख।
न पंडित, न अज्ञानी।

जो श्रीराम के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है, वही भक्ति की दृष्टि में श्रेष्ठ है।
इसीलिए रामभक्ति का अधिकार सभी योनियों को समान रूप से प्राप्त है।

इसी समभाव का प्रतिबिम्ब हमें रामचरितमानस के वाचक–श्रोता परम्परा में मिलता है—

🔹 देव वर्ग

कथावाचक – भगवान् श्री शंकर
श्रोता – भगवती पार्वती

🔹 ऋषि वर्ग

कथावाचक – महर्षि याज्ञवल्क्य
श्रोता – महर्षि भरद्वाज

🔹 मानव वर्ग

कथावाचक – नरहरिदास जी
श्रोता – गोस्वामी तुलसीदास जी

🔹 पक्षी वर्ग

श्रोता–वाचक – श्री काकभुशुण्डि जी
श्रोता – श्री गरुड़ जी

ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि काकभुशुण्डि जी ने मानस कथा शिवस्वरूप लोमस मुनि से मेरु पर्वत पर सुनी थी।
ब्रह्माण्ड पुराण के उत्तरार्द्ध में वर्णित अध्यात्म रामायण के रचयिता भी स्वयं शिव जी माने जाते हैं।
महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण और अध्यात्म रामायण—दोनों ही तुलसीदास जी के प्रमुख प्रेरणा-स्रोत रहे।

मानस की कथा समस्त जीवों को दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्त करती है।
इसीलिए कहा गया—

“रामचरितमानस एहि नामा।
सुनते श्रवन पाइय विश्रामा॥”


समकालीन Moral (आज की पीढ़ी के लिए संदेश)

आज जब content preference class, language और platform से तय होती है,
रामचरितमानस हमें सिखाती है कि सत्य और भक्ति universal होती है

यह कथा बताती है—
सुनने वाला कौन है, यह नहीं;
भाव से सुन रहा है या नहीं, यही सबसे बड़ा प्रश्न है।

यदि आज की पीढ़ी इस भाव को समझ ले,
तो मानस केवल ग्रंथ नहीं—
जीवन का मार्गदर्शक बन सकता है।

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