पंचतंत्र: कहानियाँ जो खेल-खेल में जीवन सिखा गईं
The Ancient Wisdom That Still Runs the World
जब भी हम “कहानी” शब्द सुनते हैं, दिमाग़ अक्सर बचपन की ओर चला जाता है। दादी की गोद, रात की लोरी, और वो कथाएँ जो सुनते-सुनते नींद आ जाती थी।
लेकिन आज का सवाल थोड़ा अलग है —
क्या कहानी सिर्फ़ मनोरंजन है?
या फिर वह जीवन को समझने का सबसे smart और effective तरीका भी हो सकती है?
यही सवाल पंचतंत्र सदियों पहले पूछ चुका था — और उसका उत्तर आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
पंचतंत्र की शुरुआत किसी गुरुकुल में नहीं, बल्कि एक राजमहल की चिंता से होती है।
दक्षिण भारत के एक प्रतापी राजा अमरशक्ति के तीन पुत्र थे। वे साहसी थे, पर नीति, विवेक और शास्त्रज्ञान से दूरी बनाए हुए थे। राजा के मन में एक ही प्रश्न था — “अगर बुद्धि नहीं होगी, तो सत्ता का क्या होगा?”
इसी चिंता का समाधान बनकर आए आचार्य विष्णुशर्मा।
विष्णुशर्मा ने कोई भारी-भरकम ग्रंथ खोलने की बजाय एक साहसिक संकल्प लिया। उन्होंने कहा कि वे कठिन शास्त्रों से नहीं, बल्कि कथाओं के माध्यम से, केवल छह महीनों में राजकुमारों को नीति-संपन्न बना देंगे। यह सुनकर दरबार चौंक गया — लेकिन यहीं से जन्म हुआ पंचतंत्र का।

पंचतंत्र की भूमिका में स्वयं लिखा गया है —
“नीतिशास्त्रमिदं प्रोक्तं बालानामुपकारकम्।”
अर्थात यह नीति-शास्त्र विशेष रूप से सीखने की शुरुआत करने वालों के लिए है।
यानी पंचतंत्र केवल बच्चों के लिए नहीं, बल्कि हर learner के लिए है — चाहे उम्र कोई भी हो।
“पंचतंत्र” शब्द का अर्थ है पाँच तंत्र, पाँच जीवन-सूत्र।
मित्रभेद हमें सिखाता है कि रिश्ते कैसे टूटते हैं।
मित्रलाभ बताता है कि विश्वास कैसे बनाया जाता है।
काकोलूकीयम् युद्ध और रणनीति का विज्ञान है।
लब्धप्रणाशम् यह समझाता है कि मिली हुई चीज़ें कैसे नष्ट होती हैं।
और अपरिक्षितकारकम् चेतावनी देता है — बिना सोचे किया गया कर्म क्या परिणाम लाता है।
इन कथाओं में दिखने वाले पशु — सिंह, लोमड़ी, कौआ, कछुआ — असल में हम ही हैं। हमारी महत्वाकांक्षा, हमारा भय, हमारी चालाकी और हमारी मूर्खता — सब प्रतीकात्मक रूप में सामने आती है।
यही कारण है कि पंचतंत्र भारत की सीमाओं में नहीं रुका। संस्कृत से पहलवी, फिर अरबी में कलीला व दिम्ना, वहाँ से फारसी, लैटिन और यूरोप की भाषाओं तक इसकी यात्रा हुई। आज की Aesop की Fables हों या modern moral stories —पंचतंत्र की छाया हर जगह दिखती है।
पंचतंत्र का मूल संदेश बहुत सीधा है —
“न च बुद्धिहीनः शास्त्रैः कदाचित् लाभमाप्नुयात्।”
बुद्धि और विवेक के बिना ज्ञान भी बोझ बन जाता है।
कंचन कलश की यह कथा-श्रृंखला इसी संदेश को आज की भाषा में फिर से जीवित करने का प्रयास है। यहाँ कहानियाँ सुनाई नहीं जातीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए छोड़ी जाती हैं।
तो अब आप सोचिए —
क्या आपको भी बचपन की कोई पंचतंत्र कथा आज तक याद है?
वो कहानी जिसने कभी आपको सही और गलत में फर्क सिखाया हो?
कमेंट में ज़रूर साझा करें।
क्योंकि अगला Episode आने वाला है —
मित्रभेद: जब विश्वास टूटा…
Kanchan Kalash – Faith • Culture • Consciousness
