काशी दर्शन

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि वाराणसी देश की एक सांस्कृतिक एवं धार्मिक राजधानी है और इसे यूनेस्को द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज घोषित किया गया है  तो आज हम पूरा  दिन इसी नगरी  को  जानने की कोशिश  करेंगे !सबसे पहले मैने  ट्रेन से उतरते ही देखा कि  पहले कि  अपेक्षा  प्लेटफार्म काफ़ी साफ-सुथरा  दिखाई पड़ रहा है अब मैं प्लेटफार्म से बाहर निकल रहा हू बाहर से भी स्टेशन काफ़ी दर्शनीय है, मैं  स्टेशन के सामने वाली चाय की  दुकान पर पहुंचा और यहां चाय का आनंद लिया चाय पीकर दिमाग़ तरोताजा हो गया अब समय सुबह के 4:20  हो चुके हैं  फिर मैं यहां से ऑटो पर बैठ कर दुर्गाकुंड पहुंचाऔर उसने  मुझे अस्सी जाने का रास्ता भी बताया! मैं टहलते हुए अस्सी के तरफ आगे बढ़ा,  आगे जाने पर चौराहा पड़ा मुझे  समझ में नहीं आ रहा था की किधर जाये फिर मैं अपना मोबाईल निकाला और मैप देखते हुए अस्सी घाट पहुंच गया  समय  4:54 हो चुके हैं मैं अस्सी घाट पर स्नान किया और यहां  की सुंदरता को निरेखते हुए ऊपर आया तो देखा की गायत्री परिवार के लोग यहां पर विश्व शांति के लिए मंत्रो द्वारा हवन- पूजन  कर रहे है और वही पर सुबह -ए – बनारस  प्रोग्राम चल रहा हैं जिसमे योगा सिखाया जा रहा है! मैंने वहाँ के आस -पास के लोगों  से पूछा तो उन्होंने बताया की यहां पर प्रतिदिन योगा, हवन पूजा होता है !हम  5:50पर हम अस्सी घाट से बाहर निकल कर  आगे बढ़े तो आलोक हेल्थ केयर के पास फिर से मैने चाय की चुस्की ली  फिर मैं दुर्गाकुण्ड होते हुए दुर्गा मन्दिर-, मानस मन्दिर-, बनकटी हनुमान-,संकटमोचन होते हुए लंका मार्ग पर टहलते हुए आगे बढ़ा! लंका से बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में स्थित विश्वनाथ मन्दिर के लिए ऑटो से निकल चुका हू ! रास्ते में दोनों तरभ हरियाली ही हरियाली दिखाई दे रही हैं  कुछ समय बाद  हम मन्दिर पहुंच गए! मन्दिर पूरा संगमरमर  से बना हुआ है और बहुत ही भव्य है! अंदर जा कर दर्शन कर के  मैं बाहर आया !सुबह के 8बज चुके है मैं नास्ता कर के लंका आया फिर यहां  से ऑटो में  रामनगर के लिए बैठ गया  कुछ देर में उसकी सवारी पूरी हुई तो ड्राइवर निकला थोड़ी ट्रेफिक थी जिसके वजह से रामनगर किले के पास पहुंचने में हमको 30मिनट लगभग लगे वहाँ पहुंचा तो पता चला की किला खुलने का समय 10बजे है फिर मैं यहाँ पर लोगो से पूछा की यहां का क्या प्रसिद्ध है तो स्थानीय  लोगो ने लस्सी के बारे में बताया फिर मैं लस्सी का लुप्त उठाया  इसके बाद समय भी 10बज चुके हैं !टिकट लेकर किले के अंदर गया तो राजघराने के पहनावों को देखा पहले राज घरानो में कपड़े कैसे पहने जाते  थे फिर बन्दूक , तोप, तलवार रानी का महल  और राजसी वस्तुवो को देखा  किले के अंदर ही हमारा 2घंटा बीत गया है  जल्दी ही मै बाहर  आया और खाना खाके उसी रास्ते होते हुए सारनाथ निकल चुका  हू ! सारनाथ पहुंचने में  2बज चुके है सारनाथ १० किलोमीटर पूर्वोत्तर में स्थित प्रमुख बौद्ध तीर्थस्थल है। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं दिया था जिसे “धर्म चक्र प्रवर्तन” के नाम से जाना जाता है और जो बौद्ध मत के प्रचार-प्रसार का आरंभ था। यह स्थान बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थों में से एक है । इसके साथ ही सारनाथ को जैन धर्म एवं हिन्दू धर्म में भी महत्व प्राप्त है। जैन ग्रन्थों में इसे ‘सिंहपुर’ कहा गया है और माना जाता है कि जैन धर्म के ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ का जन्म यहाँ से थोड़ी दूर पर हुआ था। यहां पर सारंगनाथ महादेव का मन्दिर भी है जहां सावन के महीने में हिन्दुओं का मेला लगता है। सारनाथ में अशोक का चतुर्मुख सिंहस्तम्भ, भगवान बुद्ध का मन्दिर, धामेख  स्तूप, चौखन्डी स्तूप, राजकीय संग्राहलय, जैन मन्दिर, चीनी मन्दिर, मूलंगधकुटी और नवीन विहार इत्यादि दर्शनीय हैं। भारत का राष्ट्रीय चिह्न यहीं के अशोक स्तंभ के मुकुट की द्विविमीय अनुकृति है। मुहम्मद गोरी ने सारनाथ के पूजा स्थलों को नष्ट कर दिया था। सन १९०५ में पुरातत्व विभाग ने यहां खुदाई का काम प्रारम्भ किया। उसी समय बौद्ध धर्म के अनुयायों और इतिहास के विद्वानों का ध्यान इधर गया। वर्तमान में सारनाथ एक तीर्थ स्थल और पर्यटन स्थल के रूप में लगातार वृद्धि की ओर अग्रसर है। इन सब में से हम कुछ ही जगह घूम पाए है पांच बज चुके है अब यहां से हम दसाश्वमेध घाट निकल चुके है ट्रेफिक के चलते हम को दशाश्वमेध पहुंचने में 1:45 मिनट लगभग लगा थोड़ी बहुत इसकी जानकारी लोगो से पूछने पर मिली की  की  ,दशाश्वमेध वाराणसी में गंगातटवर्ती सुप्रसिद्ध स्थान है जिसका धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। काशीखंड के अनुसार शिवप्रेषित ब्रह्मा ने काशी में आकर यहीं पर दस अश्वमेध यज्ञ किया था । शिवरहस्य के अनुसार यहाँ पहले रुद्रसरोवर था परंतु गंगाआगमन  के बाद पूर्व गंगापार, दक्षिण दशहरेश्वर, पश्चिम अगस्त्यकुंड और उत्तर सोमनाथ इसकी चौहद्दी बनी। यहाँ प्रयागेश्वर का मंदिर है। काशीप्रसाद जायसवाल के मत से भारशिवों ने जिस स्थान पर दस अश्वमेघ किए वह यही भूमि है। सन् 1929 में यहाँ रानी पुटिया के मंदिर के नीचे खोदाई में अनेक यज्ञकुंड निकले थे। त्रितीर्थी में यहाँ स्नान करना अनिवार्य है। फिर मै गंगा आरती देखने के बाद बाबा विश्वनाथ का दर्शन  किया जहाँ बहुत कड़ी चेकिंग के बाद पहुंचा यहाँ  से निकलने के बाद  चाट इत्यादि खाते हुए स्टेशन निकल चुका हू  मुझे  25मिनट लगे स्टेशन पहुंचने में 10बज चुके है ट्रेन का इन्जार है क्योंकि यहां से मुझे  अपने घर की ओर   निकलना है

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अनुभव -अद्धभुत, अकल्पनीय, अविश्वशनीय सभ्यता एवं सांस्कृतिक की धरोहर काशी

शत शत नमन काशी

“अमरेश पाण्डेय “

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