और दरवाजा बंद हो गया….

ठक.. ठक..ठक दस्तक द्वार पर हुई

दो कदम चल फिर घर की ओर मुड़े

दिन भर भूखा प्यासा दौड़ता रहा,हर रोज की तरह

पर किस्मत के द्वार बंद मिले,अमावस्या घनघोर रात्रि की तरह

कल जब बचपना था,तुतलाहट में घुला मां का प्यार

भाई भर भुजा उठा लेता,पापा करते अपने जीवन तक निसार

बहना बांध राखी देती दुआ उम्र तेरा कभी न हारे,

मेरे मधुर चमन के कली तेरा रूप सदा चंद्रा सी रहे

भौरों के गुंजन था मेरा जीवन का अभिनंदन,

पवन के झकोडे़ थे मेरे स्वप्न के सुख स्यानन्द

पर आज जब जवानी है आई,

दूर भागती जा रही मेरी अपनी परछाई

तब कौन किसको पलट कर देखता है,

कहां वो प्यार की कहानी को पुनः दोहराता है

सभी स्वयं में इस कदर लीन हैं,

कि स्वार्थ पूर्ति मुझसे हो सकेगा उनका यही यकीन है

इसलिए दरवाजे उनके खुले थे ,प्यार के इंतजार में दो आंखें बिछी थीं

उनके पीछे क्या भावना हो सकती है ,यह रहस्य अब तक उनके मन में छिपी थी

पर जब डिग्रीयां ले भटकता रहा दर ब दर,

कोई ठिकाना न मिल पाया ,टुट चुका जब दिल इस कदर

कि डिग्रियों को छोभ की ज्वाला में जला डाला ,

सभी ने​ तब मुझे ही त्याग डाला

और उनके दिल के द्वार बंद हो गये,

किस्मत और प्यार के इंतजार बंद  हो गये

फिर भी मैं दस्तक द्वार पर दिये जा रहा हूं,

थक कर मौत के करीब जा रहा हूं

जाने कभी ये द्वार खुले मिलेंगे भी

कह दे कोई मैं इन्सान होकर भी दागदार नहीं,

तो मैं कहूंगा वो इन्सान नहीं

Leave a Comment